मेरी कविताये

मन मे उमडे भावो को जब भी मैने लिख्नने का प्रयास किया बाद मे देखा तो कविता बन गई

Sunday, July 05, 2009

हम इंतजार करते हैं

कभी कोई अनजाना
अपना हो जाता है.
कभी किसी से
प्यार हो जाता है.
ये जरूरी नहीं
कि जो खुशी दे
उसी से प्यार हो.
दिल तोडने वाले से भी
प्यार हो जाता है.
जिन्दगी हर कदम पर
इम्तिहान लेती है,
तन्हाई हर मोड पर
धोखा देती है.
फिर भी हम
जिन्दगी से प्यार करते हैं
क्यूंकि हम किसी का
इंतजार करते हैं.
कुछ दोस्तों का
हां दोस्तों का
इंतजार करते हैं.

Friday, November 21, 2008

कुछ दिनो से

कुछ दिनो से
ये शहर लगता उदास है
उपर से शान्त पर
अन्दर से बना आग है.
कुछ दिनो से
सान्झ होते ही
खिडकिया और दरवाजे
हो जाते है बन्द
और लोग अपने ही घरो मे
होकर रह जाते है कैद.
कुछ दिनो से
लगता ही नही कि
रहता है यहा कोई आदमी भी
चारो ओर होती है खामोशी
और खामोशी के दौर मे
हवा का शोर होता है.
कुछ दिनो से
इस शहर मे
चलती हवा ऐसी है
कि घुटन लगती है
चारो ओर अजीब सी
गन्ध मिलती है.
कुछ रोज से ये शहर
लगता विरान है
चन्द दिनो पहले जो घर था
अब लगता सिर्फ मकान है.
(22.11.1989 को रचित)

अखबार

इन अखबारो मे
क्या रहते है
सिर्फ़ हादसे और
ह़गामे ही
भरे रहते है.
इसके हरेक पन्ने पर
लाशो की फ़ेहरिश्त
और इसपर
खून के छीटे
पडे रहते है.

Saturday, September 16, 2006

jharkhand: yatharth

Monday, September 11, 2006

yatharth


kya nahin lagta ki
pedon ki pattiyan
apna rang kho rahi hain
thik waise hi
jaise rah chalte
logon ke chehre se
gayab ho rahi hai muskan.
kabhi kabhi lagta hai
ki har subah jo oos milti hai
pedon ki payyiyon par padi hui
wah dard hai unki jo
we chahkar bhi din men
nikal nahin pati hain
suraj ke dar se.
thik waise hi jaise
koi aam aadmi chahkar bhi
ro nahin pata hai
jamane ke dar se
apne gamon ko liye
bhatakta hi rahta hai wah
tamam zindagi
yah jankar bhi ki
yahan har aadmi usi tarah
bhatak raha hai
apne dukhon ko
apne men samete huwe.